श्री राजारामजी महाराज का जन्म चेत्र शुक्ला 9, संवत् 1939 को शिकारपुरा गाँव में पटेल कालबी परिवार में हुआ। बचपन में ही पिता का, और उसके कुछ समय बाद माता का देहांत हो गया। माता-पिता के देहांत के बाद वे रिश्तेदारों के यहाँ रहे और गाय चराने तथा खेतों में मजदूरी करने लगे। बहुत कम भोजन (रोटी) मिलने पर भी वे उसका आधा हिस्सा कुत्तों को खिला देते थे - यह उनकी बचपन से ही करुणा और भक्ति का परिचायक था।
संत देवभारती जी ने उनकी भक्ति भावना को पहचानकर समाधि लेने से पूर्व उन्हें अपनी आध्यात्मिक शक्तियां प्रदान कीं। इसके पश्चात राजारामजी में अनेक चमत्कारिक घटनाएं घटित हुईं, और उन्होंने सांसारिक जीवन का त्याग कर दिया।
उन्होंने द्वारका की पैदल एवं दंडवत यात्रा पांच दिनों में पूर्ण की। दस महीने बाद शिकारपुरा लौटकर उन्होंने छह महीने तक मौन धारण किया, और तत्पश्चात हजारों लोगों को उपदेश देना प्रारंभ किया।
उन्होंने महादेव मंदिर एवं आश्रम की स्थापना की, शिक्षा के प्रचार-प्रसार हेतु कार्य किया, तथा बाल-विवाह एवं नशाखोरी जैसी सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध जनजागरण किया। श्रावण वदी 14, संवत् 2000 को उन्होंने समाधि ली।







